AGRICULTURE

Cultivation of Pigeon Pea: सावन के महीने में करें अरहर की इन 5 बेहतरीन किस्मों की खेती, होगा अधिक उत्पादन

Cultivation of Pigeon Pea: सावन के महीने में मानसून अपनी गति पकड़ लेता है, लेकिन किसानों के लिए यह एक अनोखा समय होता है। दरअसल, सावन के महीने में खेती से अच्छी-खासी कमाई हो सकती है। खासकर खरीफ सीजन (Kharif Season) की प्रमुख दलहनी फसलों से, किसान अपनी आय को चौगुना तक बढ़ा सकते हैं। अगर किसान इस दौरान अपने खेतों में दलहनी फसल अरहर (तुअर) उगाएँ तो उन्हें ज़्यादा कमाई हो सकती है। इस श्रृंखला के तहत, हमने किसानों को अरहर की पाँच उन्नत किस्मों के बारे में जानकारी दी है जो कम समय में उपज बढ़ा देती हैं।

Cultivation of pigeon pea

वैज्ञानिकों ने यह भी बताया है कि जिन किस्मों पर हम चर्चा करेंगे, वे किसानों के लिए अच्छी हैं। इन किस्मों की उपज ज़्यादा होती है, ये जल्दी पकती हैं और रोगों के प्रति प्रतिरोधी होती हैं। हमें इन अनोखी किस्मों के बारे में बताएँ।

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अरहर की यह किस्म जल्दी पक जाती है, इसलिए यह एक अगेती किस्म है। इस किस्म को लगाने का सबसे अच्छा समय जुलाई है। यह 120 दिनों में पक जाती है। इसके दाने घने होते हैं और पौधे की लंबाई कम होती है। औसतन उत्पादन एक टन प्रति एकड़ तक पहुँच सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) ने इसे विकसित किया है।

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यह अन्य किस्मों की तुलना में थोड़ी देर से पकती है, जिससे यह एक पछेती किस्म बन जाती है। मानसून आने के बाद, इस किस्म के बीज बोए जाते हैं। पकने में 150-170 दिन लगते हैं। मोज़ेक वायरस और विल्ट (Mosaic Virus and Wilt) जैसे रोग इस किस्म को नुकसान नहीं पहुँचा पाते। इसके अलावा, औसत उत्पादन लगभग एक टन प्रति हेक्टेयर होता है। IARI ने इसे भी विकसित किया है।

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यह अरहर की एक किस्म है जो जल्दी पक जाती है। इसका दाना चमकदार, मोटा और भूरे रंग का होता है। 120 से 140 दिनों में फसल तैयार हो जाती है। प्रति एकड़ छह क्विंटल तक उत्पादन होता है। यह राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में विशेष रूप से लोकप्रिय है।

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यह किस्म रोग प्रतिरोधी है। यह फसल को कई तरह की बीमारियों से बचा सकती है। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर औसतन 18-20 क्विंटल उपज प्राप्त हो सकती है। बुवाई के लिए जून वर्ष का आदर्श समय है।

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इस अरहर की किस्म (Arhar Variety) के पौधे छोटे होते हैं, इसलिए इसकी कटाई 130 से 150 दिनों में हो जाती है। लंबी, मोटी फलियाँ एक साथ समूह में होती हैं। प्रति हेक्टेयर औसतन उपज 15 से 20 क्विंटल तक हो सकती है।

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