AGRICULTURE

Cucumber Farming – वैज्ञानिक तरीके से खीरे की खेती में बढ़ेगी पैदावार

Cucumber Farming – शाहजहांपुर में खीरे की खेती को लेकर कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने की सलाह दी है। कम समय में तैयार होने वाली यह फसल अच्छी आमदनी दे सकती है, लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह सही तैयारी और प्रबंधन पर निर्भर करती है। कई बार जल्दबाजी में बिना मिट्टी की जांच या उपचार के बुवाई कर दी जाती है, जिससे कीट और रोग तेजी से फैलते हैं और उत्पादन घट जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अच्छी किस्म का बीज चुन लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि खेत की तैयारी और बीज उपचार पर भी बराबर ध्यान देना जरूरी है।

Scientific cucumber farming yield tips

विशेषज्ञों की सलाह: तैयारी से तय होती है पैदावार

कृषि विज्ञान केंद्र नियामतपुर के कृषि विशेषज्ञ डॉ. हादी हुसैन खान के अनुसार, सफल उत्पादन की शुरुआत बीज चयन और उपचार से होती है। यदि मिट्टी में पहले से रोग या कीट मौजूद हैं तो वे अंकुरित पौधों को शुरुआती अवस्था में ही नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए बुवाई से पहले खेत को अच्छी तरह तैयार करना जरूरी है।

उन्होंने बताया कि खेत की दो से तीन बार गहरी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। इससे न केवल जड़ों को फैलने में आसानी होती है, बल्कि जल निकास भी बेहतर रहता है। जुताई के दौरान सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाना मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करता है।

जैविक खाद से मिट्टी को मिले मजबूती

खीरे की खेती में जैविक खाद की अहम भूमिका मानी जाती है। प्रति हेक्टेयर लगभग 10 टन सड़ी गोबर की खाद डालने से मिट्टी की संरचना सुधरती है और उसमें कार्बनिक तत्वों की मात्रा बढ़ती है। इससे पौधों की जड़ें मजबूत बनती हैं और वे पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से ग्रहण कर पाती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि जिन खेतों में नियमित रूप से जैविक खाद का उपयोग होता है, वहां उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर रहती है। साथ ही रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम होती है, जिससे लागत पर नियंत्रण रखा जा सकता है।

बुवाई की सही तकनीक से मिलेगा बेहतर परिणाम

डॉ. खान ने बताया कि बीज की गहराई और दूरी का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। कई किसान बीज को अधिक गहराई पर बो देते हैं, जिससे अंकुरण प्रभावित होता है। बीज को लगभग 2 सेंटीमीटर की गहराई पर ही बोना चाहिए।

खेत में 2 मीटर चौड़ी क्यारियां बनाकर बुवाई करने से पौधों को पर्याप्त जगह मिलती है। इससे हवा का संचार बेहतर रहता है और रोगों की संभावना कम होती है। उचित दूरी पर पौधे लगाने से सिंचाई और कीट प्रबंधन भी आसान हो जाता है।

कीट और रोग नियंत्रण में सावधानी जरूरी

खीरे की फसल पर कीटों और फफूंदजनित रोगों का खतरा बना रहता है। यदि खेत की तैयारी सही ढंग से न की जाए तो शुरुआती अवस्था में ही पौधे कमजोर हो सकते हैं। इसलिए बीजोपचार के साथ-साथ मिट्टी उपचार भी जरूरी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय-समय पर फसल का निरीक्षण करते रहना चाहिए, ताकि किसी भी समस्या की पहचान शुरुआती स्तर पर हो सके। संतुलित सिंचाई और साफ-सफाई भी रोग नियंत्रण में सहायक होती है।

कम लागत में अधिक मुनाफे की संभावना

यदि किसान वैज्ञानिक पद्धति अपनाएं और मिट्टी की सेहत पर ध्यान दें तो खीरे की खेती से बेहतर आमदनी संभव है। उचित दूरी, सही खाद और समय पर देखभाल से उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।

कृषि विशेषज्ञों ने किसानों से अपील की है कि वे पारंपरिक तरीकों के साथ वैज्ञानिक सलाह को भी शामिल करें, ताकि कम समय में तैयार होने वाली इस फसल से अधिक लाभ प्राप्त किया जा सके।

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