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Agriculture Tips: छतरपुर में बढ़ती ठंड के बीच किसानों ने अपनाए देसी तरीके, फसल सुरक्षा बनी सबसे बड़ी प्राथमिकता

Agriculture Tips: छतरपुर जिले में इस समय कड़ाके की ठंड और लगातार गिरते तापमान ने किसानों की परेशानी बढ़ा दी है। खासतौर पर सब्जी उत्पादन करने वाले किसान पाले और शीत लहर के कारण अपनी फसलों को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं। टमाटर, मिर्च, बैंगन, फूलगोभी जैसी संवेदनशील फसलें ठंड के मौसम में जल्दी प्रभावित होती हैं। ऐसे हालात में किसान आधुनिक संसाधनों के साथ-साथ पुराने और आजमाए हुए देसी उपायों का सहारा ले रहे हैं, ताकि मेहनत से उगाई गई फसल को नुकसान से बचाया जा सके।

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ठंड और पाले से फसलों पर बढ़ता खतरा

जिले में तापमान लगातार नीचे जा रहा है, जिससे रात और सुबह के समय खेतों में पाले का असर साफ दिखाई देने लगा है। पाला पड़ने से पौधों की पत्तियां झुलस जाती हैं और सब्जियों की बढ़वार रुक जाती है। कई बार तो पूरी फसल बर्बाद होने की नौबत आ जाती है। किसानों के लिए यह समय बेहद संवेदनशील होता है, क्योंकि थोड़ी सी लापरवाही लाखों रुपये के नुकसान का कारण बन सकती है। यही वजह है कि किसान हर संभव उपाय अपनाने में जुटे हुए हैं।

किसानों ने अपनाया देसी जुगाड़

छतरपुर के कई गांवों में किसान पारंपरिक तरीकों का उपयोग कर रहे हैं। तेजराम जैसे अनुभवी किसान बताते हैं कि उनके पास लगभग दस बीघा जमीन है, जिसमें उन्होंने सब्जियों की खेती की है। बीते कुछ दिनों से कम धूप, घना कोहरा और ठंडी हवाओं के कारण फसलें पाले की चपेट में आने लगी थीं। ऐसे में उन्होंने अपने बुजुर्गों से सीखे पुराने उपाय को अपनाया और खेत के चारों ओर धुआं करना शुरू किया। उनके अनुसार यह तरीका आज भी उतना ही कारगर है जितना पहले हुआ करता था।

धुआं करने की प्रक्रिया और उसका प्रभाव

किसान तेजराम बताते हैं कि वे रात करीब दस बजे से लेकर सुबह के समय तक खेत के चारों ओर धुआं करते हैं। इसके लिए सूखी घास, पत्ते और जैविक अवशेषों का उपयोग किया जाता है। जब यह सामग्री जलती है तो उससे निकलने वाला धुआं खेत के वातावरण में फैल जाता है। यह धुआं एक परत की तरह काम करता है, जिससे ठंडी हवा और ओस सीधे फसलों पर नहीं पड़ती। इससे पाले का असर काफी हद तक कम हो जाता है और पौधे सुरक्षित रहते हैं।

सिंचाई और छिड़काव का भी सहारा

धुएं के साथ-साथ किसान हल्की सिंचाई भी कर रहे हैं। सुबह के समय हल्का पानी देने से पौधों का तापमान संतुलित रहता है और पाले से होने वाला नुकसान घटता है। इसके अलावा कुछ किसान समय-समय पर सल्फर का छिड़काव भी करते हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह उपाय पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है और ठंड के दुष्प्रभाव को कम करता है।

कृषि विभाग और वैज्ञानिकों की राय

कृषि विभाग और वैज्ञानिकों का मानना है कि यह देसी तरीका पूरी तरह व्यावहारिक और प्रभावी है। जब संसाधन सीमित हों, तब ऐसे उपाय किसानों के लिए वरदान साबित होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि धुआं करने से खेत का माइक्रो क्लाइमेट बदलता है, जिससे तापमान में अचानक गिरावट का असर कम हो जाता है। साथ ही किसानों को सलाह दी जाती है कि वे मौसम की जानकारी पर नजर रखें और समय रहते फसल सुरक्षा के उपाय अपनाएं।

पुराना अनुभव, आज भी भरोसेमंद

किसानों का कहना है कि यह जुगाड़ कोई नया नहीं है, बल्कि सालों से अपनाया जा रहा है। पहले के समय में जब आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तब भी किसान इसी तरह अपनी फसलों को बचाते थे। आज भी यह तरीका उतना ही भरोसेमंद है। तेजराम बताते हैं कि इस उपाय से उनकी फसलें सुरक्षित रहती हैं और उन्हें भारी आर्थिक नुकसान से बचने में मदद मिलती है। कई किसानों के अनुसार इस तरह के उपायों से लाखों रुपये की फसल हर साल बचाई जा रही है।

फसल सुरक्षा के लिए सतर्कता जरूरी

ठंड के मौसम में फसल बचाने के लिए केवल एक उपाय काफी नहीं होता। किसानों को लगातार खेतों की निगरानी करनी पड़ती है। मौसम में होने वाले बदलावों को समझकर समय पर सही कदम उठाना जरूरी है। देसी तरीकों के साथ अगर सही सलाह और सतर्कता बरती जाए, तो ठंड और पाले के बावजूद अच्छी पैदावार संभव है।

अंत में कहा जा सकता है कि छतरपुर जिले के किसानों ने यह साबित कर दिया है कि अनुभव और परंपरागत ज्ञान आज भी खेती के काम आता है। आधुनिक तकनीक के साथ जब देसी समझदारी जुड़ती है, तो खेती ज्यादा सुरक्षित और लाभकारी बन जाती है।

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