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Agriculture tips: जनवरी में अगेती भिंडी की खेती से कम समय में अधिक मुनाफा कमाने का भरोसेमंद तरीका

Agriculture tips: नए साल की शुरुआत सब्जी उत्पादक किसानों के लिए नई उम्मीदें लेकर आती है। जनवरी का महीना खासतौर पर उन किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है, जो कम समय में अधिक आमदनी की योजना बना रहे हैं। अगेती भिंडी की खेती ऐसी ही एक विकल्प है, जो थोड़े समय में तैयार होकर बाजार में ऊँचे दाम दिलाने की क्षमता रखती है। जब बाजार में भिंडी की उपलब्धता कम होती है, तब इसकी मांग और कीमत दोनों तेजी से बढ़ जाती हैं। इसी कारण अगेती भिंडी की खेती आज के समय में किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

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अगेती भिंडी क्यों बन रही है किसानों की पहली पसंद

अगेती भिंडी की सबसे बड़ी खासियत इसका जल्दी तैयार होना है। यह फसल बोने के करीब 40 से 50 दिनों के भीतर तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। कम अवधि में तैयार होने के कारण किसान जल्दी बाजार में फसल पहुंचा पाते हैं। इस समय सब्जियों की कमी के चलते भिंडी को अच्छा भाव मिलता है। इसके अलावा इस फसल में लागत अपेक्षाकृत कम आती है और जोखिम भी सीमित रहता है, जिससे किसानों को सुरक्षित कमाई का अवसर मिलता है।

बुवाई का उपयुक्त समय और जलवायु

अगेती भिंडी की सफल खेती के लिए सही समय पर बुवाई बेहद जरूरी है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार 20 जनवरी से 15 फरवरी के बीच का समय इसके लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। ठंड और पाले का असर भिंडी की फसल पर नकारात्मक हो सकता है, खासकर उत्तर और मध्य भारत के क्षेत्रों में। इसी वजह से बसंत पंचमी के बाद बुवाई करना ज्यादा सुरक्षित रहता है। इस संबंध में देवघर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक साओन चक्रवर्ती भी किसानों को मौसम के अनुसार बुवाई की सलाह देते हैं।

बाजार में भाव और संभावित आमदनी

जब अगेती भिंडी बाजार में पहुंचती है, उस समय इसकी आवक बहुत कम होती है। इसी कारण मंडियों में इसका भाव 70 रुपये से लेकर 100 रुपये प्रति किलो तक मिल सकता है। यदि किसान फसल की देखभाल सही तरीके से करें और समय पर तुड़ाई करें, तो एक एकड़ से लाख रुपये या उससे अधिक की आमदनी संभव है। यही कारण है कि यह खेती छोटे और मध्यम किसानों के लिए भी लाभकारी मानी जाती है।

खेत की तैयारी और पोषक तत्व प्रबंधन

अच्छी पैदावार के लिए खेत की तैयारी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भिंडी की खेती के लिए दो से तीन बार गहरी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बनाना चाहिए। अंतिम जुताई के समय सड़ी हुई गोबर खाद या वर्मी कंपोस्ट मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। इसके साथ ही रासायनिक उर्वरकों में एक एकड़ क्षेत्र के लिए डीएपी और पोटाश का संतुलित प्रयोग किया जाता है। जरूरत के अनुसार यूरिया की मात्रा भी दी जाती है, जिससे पौधों की बढ़वार अच्छी होती है।

बुवाई की विधि और बीज की मात्रा

अगेती भिंडी की खेती में मेड विधि को सबसे प्रभावी माना जाता है। इस विधि में खेत में लगभग 18-18 इंच की दूरी पर मेड बनाकर बीज बोए जाते हैं। इससे जल निकास बेहतर रहता है और जड़ों को पर्याप्त जगह मिलती है। प्रति एकड़ लगभग 2.5 से 3 किलो बीज पर्याप्त होता है। बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना भी जरूरी है, जिससे अंकुरण अच्छा होता है और शुरुआती रोगों से बचाव होता है।

रोग और कीट प्रबंधन के उपाय

भिंडी की फसल में जड़ों में गांठ बनने की समस्या एक बड़ी चुनौती है। यह समस्या उत्पादन को काफी हद तक प्रभावित कर सकती है। इससे बचाव के लिए खेत की तैयारी के समय आवश्यक दवाओं का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा समय-समय पर खेत का निरीक्षण कर कीट और रोगों की पहचान करना जरूरी है। प्रारंभिक अवस्था में नियंत्रण करने से नुकसान कम होता है और फसल सुरक्षित रहती है।

उन्नत किस्मों का चयन और देखभाल

अच्छी उपज और बाजार में पसंद की जाने वाली गुणवत्ता पाने के लिए उन्नत किस्मों का चयन करना जरूरी है। आज के समय में कई हाइब्रिड किस्में उपलब्ध हैं, जो कम समय में अधिक उत्पादन देती हैं। इन किस्मों में फल एकसार, मुलायम और आकर्षक होते हैं, जिससे बाजार में मांग बनी रहती है। खरपतवार नियंत्रण और सिंचाई का सही प्रबंधन करने से फसल की उत्पादकता और बढ़ाई जा सकती है।

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