AGRICULTURE

Farming Success story – वर्मी कंपोस्ट से किसान ने बदली खेती की तस्वीर

Farming Success story – उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में एक युवा किसान ने पारंपरिक खेती को नए नजरिए से अपनाकर उसे फायदे का सौदा बना दिया है। ज्ञानेश तिवारी नाम के इस किसान ने खेती के साथ वर्मी कंपोस्ट उत्पादन को जोड़कर अपनी आमदनी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है। जहां कई किसान खेती को घाटे का व्यवसाय मानते हैं, वहीं ज्ञानेश ने इसे आधुनिक तकनीक और सही रणनीति के जरिए लाभकारी मॉडल में बदल दिया है।

Farming success vermicompost income model

डेयरी से शुरू हुई सफलता की राह
ज्ञानेश तिवारी ने अपनी यात्रा की शुरुआत वर्ष 2014 में डेयरी फार्मिंग से की थी। उस समय उन्होंने लगभग 100 पशुओं के साथ काम शुरू किया। पशुपालन के दौरान निकलने वाले गोबर के बेहतर उपयोग को ध्यान में रखते हुए उन्होंने आगे बढ़कर वर्मी कंपोस्ट उत्पादन का रास्ता चुना। शुरुआत छोटे स्तर से हुई, लेकिन उनकी सोच शुरू से ही इसे बड़े व्यवसाय में बदलने की थी।

छोटे प्रयोग से बड़े उत्पादन तक का सफर
साल 2016 में कृषि विभाग और स्थानीय चीनी मिल के तकनीकी सहयोग से उन्होंने मात्र दो गड्ढों में वर्मी कंपोस्ट बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने आधुनिक तरीकों जैसे एचडीपीई बेड, पिट मेथड और विंड्रो मेथड को अपनाया। आज उनके पास 250 से अधिक वर्मी बेड हैं, जिनसे हर साल 1500 से 1700 क्विंटल तक जैविक खाद तैयार होती है। उनकी तैयार खाद बाजार में करीब 800 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिकती है, जिससे उन्हें स्थिर और अच्छा मुनाफा मिलता है।

केंचुओं की बिक्री भी बनी आय का मजबूत स्रोत
ज्ञानेश ने केवल खाद उत्पादन तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने केंचुओं की आपूर्ति को भी व्यवसाय का हिस्सा बनाया। पिछले वर्ष उन्होंने लगभग 6.5 टन केंचुओं की बिक्री की, जिससे उनकी आय में अतिरिक्त बढ़ोतरी हुई। इस मॉडल ने उन्हें एक सफल कृषि उद्यमी के रूप में पहचान दिलाई है।

जैविक खेती से लागत में कमी और गुणवत्ता में सुधार
वर्मी कंपोस्ट के उपयोग से उनकी खेती की लागत में काफी कमी आई है। रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटने से मिट्टी की उर्वरता में सुधार हुआ है और फसलों की गुणवत्ता भी बेहतर हुई है। ज्ञानेश का अनुभव बताता है कि जैविक खेती न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी मददगार साबित हो सकती है।

अन्य किसानों को भी दे रहे हैं प्रशिक्षण
ज्ञानेश तिवारी अब अपने अनुभव को दूसरों के साथ साझा कर रहे हैं। वे किसानों को वर्मी कंपोस्ट यूनिट स्थापित करने में मदद करते हैं और उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करते हैं। सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर जागरूकता फैलाकर वे किसानों को यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि खाद खरीदने के बजाय खुद उत्पादन करना ज्यादा लाभदायक है।

सरकारी योजनाओं और तकनीकी सहयोग की भूमिका
उनकी सफलता में सरकारी योजनाओं और कृषि विशेषज्ञों का अहम योगदान रहा है। ज्ञानेश का मानना है कि यदि किसान सही जानकारी और तकनीकी मार्गदर्शन के साथ काम करें, तो कम संसाधनों में भी अच्छा लाभ कमा सकते हैं। उनका कहना है कि दो या चार पशुओं के साथ भी वर्मी कंपोस्ट का काम शुरू किया जा सकता है और सीधे सरकारी लाभ उठाया जा सकता है।

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