Animal husbandry success story -लखीमपुर में बकरी पालन से बदली इस मेहनती किसान की अर्थव्यवस्था
Animal husbandry success story – उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में बकरी पालन धीरे-धीरे ग्रामीण आजीविका का मजबूत सहारा बनता जा रहा है। कम लागत और स्थिर आमदनी की वजह से यह काम गांवों में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। स्थानीय किसान बताते हैं कि सीमित संसाधनों के बावजूद यह व्यवसाय शुरू किया जा सकता है और समय के साथ इसमें अच्छा विस्तार संभव है। सरकार की ओर से भी पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाओं के तहत अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे छोटे किसानों को शुरुआती सहायता मिल रही है।

कम निवेश में बेहतर आमदनी का जरिया
ग्रामीण इलाकों में खेती के साथ-साथ अतिरिक्त आय के साधन की जरूरत हमेशा महसूस की जाती रही है। ऐसे में बकरी पालन एक व्यवहारिक विकल्प के रूप में उभरा है। इस काम में भारी पूंजी लगाने की आवश्यकता नहीं होती और देखभाल भी अपेक्षाकृत आसान मानी जाती है।
बकरी से मांस और दूध के अलावा जैविक खाद भी मिलती है, जिससे खेती में लागत कम की जा सकती है। यही कारण है कि छोटे और सीमांत किसान इसे आय के पूरक स्रोत के तौर पर अपना रहे हैं। पशुपालन विशेषज्ञ डॉ. नागेंद्र कुमार त्रिपाठी के अनुसार, जिले के तराई क्षेत्र की जलवायु कुछ खास नस्लों के लिए अनुकूल है, जिससे उत्पादन बेहतर होता है।
ब्लैक बंगाल नस्ल की मांग
विशेषज्ञों का कहना है कि लखीमपुर खीरी के मौसम में ब्लैक बंगाल नस्ल की बकरियां ज्यादा लाभकारी साबित होती हैं। यह नस्ल लगभग पांच महीने की गर्भावधि के बाद बच्चों को जन्म देती है और डेढ़ साल के भीतर दो बार प्रजनन करने की क्षमता रखती है। तेज प्रजनन दर के कारण पशुपालकों को झुंड बढ़ाने में ज्यादा समय नहीं लगता।
स्थानीय बाजार में इस नस्ल की मांग भी अच्छी रहती है। त्योहारों और विशेष अवसरों पर बकरियों की बिक्री बढ़ जाती है, जिससे पशुपालकों को नकद आय मिलती है।
महिलाओं के लिए भी अवसर
बकरी पालन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ रही है। खीरी जिले की निवासी सुनीता बताती हैं कि उन्होंने चार साल पहले तीन बकरियों से शुरुआत की थी। आज उनके पास 15 से अधिक बकरियां हैं। उनका कहना है कि नियमित देखभाल और सही समय पर बिक्री से परिवार की आमदनी में स्थिरता आई है।
सुनीता के मुताबिक, एक बकरी सामान्य तौर पर साल में दो बार बच्चों को जन्म देती है, जिससे संख्या तेजी से बढ़ती है। बाजार में एक बकरी तीन से चार हजार रुपये तक आसानी से बिक जाती है। यह रकम घरेलू खर्च और बच्चों की पढ़ाई जैसे जरूरी कामों में सहायक होती है।
पढ़े-लिखे युवाओं का रुझान
पशुपालन विभाग के अनुसार, अब केवल पारंपरिक किसान ही नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे युवा भी इस क्षेत्र में रुचि ले रहे हैं। कुछ लोग नौकरी के साथ-साथ अतिरिक्त आय के लिए बकरी पालन शुरू कर रहे हैं, तो कुछ इसे पूर्णकालिक व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन किया जाए, टीकाकरण और पोषण पर ध्यान दिया जाए, तो यह व्यवसाय लंबे समय तक स्थिर आय दे सकता है।
कुल मिलाकर, लखीमपुर खीरी में बकरी पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहा है। कम लागत, तेज प्रजनन और बाजार में मांग की वजह से यह गतिविधि आने वाले समय में और विस्तार पा सकती है।

