BambooFarming – लखीमपुर खीरी में खुल गई किसानों की नई कमाई की राह
BambooFarming – उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में खेती की तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने वाले किसान अब वैकल्पिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। खासकर बांस की खेती यहां आय का भरोसेमंद माध्यम बनती दिख रही है। कम लागत, लंबे समय तक उत्पादन और बाजार में स्थिर मांग ने इसे किसानों के बीच लोकप्रिय बना दिया है। स्थानीय स्तर से लेकर बड़े बाजारों तक इसकी मांग बढ़ने से किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है।

बाजार में बढ़ती मांग से बढ़ा आकर्षण
बांस अब सिर्फ पारंपरिक उपयोग तक सीमित नहीं रहा। निर्माण कार्यों में मचान और सीढ़ियों के अलावा अगरबत्ती उद्योग में इसकी तीलियों की भारी खपत होती है। इसके साथ ही पर्यावरण के अनुकूल फर्नीचर, सजावटी सामान और घरेलू उपयोग की वस्तुओं में भी बांस का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। कागज उद्योग में इसकी मांग पहले से ही स्थिर रही है। हाल के वर्षों में बांस से बने कपड़े और खाद्य उत्पादों ने भी बाजार में अपनी जगह बनाई है। यही वजह है कि किसानों को अपनी उपज के लिए स्थानीय व्यापारियों से लेकर फैक्ट्रियों तक आसानी से खरीदार मिल रहे हैं।
कम पानी और बंजर जमीन में भी बेहतर उत्पादन
बांस की खेती की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अनुकूलन क्षमता है। इसे अत्यधिक उपजाऊ जमीन की आवश्यकता नहीं होती। कम पानी में भी यह अच्छी तरह विकसित हो जाता है, जिससे सिंचाई पर खर्च कम आता है। एक बार पौधा स्थापित हो जाने के बाद कई दशकों तक उत्पादन मिलता रहता है। जानकारों के मुताबिक एक पौधे से 40 से 50 वर्षों तक लगातार बांस प्राप्त किया जा सकता है। रखरखाव भी अपेक्षाकृत आसान है, जिससे श्रम लागत कम रहती है और किसानों का जोखिम घटता है।
फसल जोखिम से बचने का विकल्प
जिले के कई किसान प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान से परेशान रहे हैं। तेज आंधी या बारिश से पारंपरिक फसलें अक्सर प्रभावित होती हैं। ऐसे में बांस अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प साबित हो रहा है। स्थानीय किसान यदुनंदन सिंह बताते हैं कि पहले वे केले की खेती करते थे, लेकिन मौसम की मार से कई बार नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद उन्होंने बांस की खेती शुरू की। उनका कहना है कि इस फसल पर मौसम का असर कम पड़ता है और रोग भी बहुत कम लगते हैं। वर्तमान में वे करीब तीन बीघा क्षेत्र में बांस उगा रहे हैं और अन्य किसानों को भी इसकी जानकारी दे रहे हैं।
रोपाई और कटाई का सही समय
विशेषज्ञों के अनुसार बांस की पौध रोपने के लिए जुलाई का महीना उपयुक्त माना जाता है। इस दौरान मिट्टी में पर्याप्त नमी रहती है, जिससे पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं। रोपाई के लगभग चार वर्ष बाद कटाई शुरू की जा सकती है। गुणवत्ता के आधार पर बाजार में एक बांस की कीमत 100 से 200 रुपये तक मिल जाती है। यदि उचित देखभाल की जाए तो प्रति बीघा अच्छी आय संभव है। यही कारण है कि जिले में धीरे-धीरे बांस की खेती का रकबा बढ़ता जा रहा है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रहा सहारा
बांस की बढ़ती खेती का असर स्थानीय रोजगार पर भी दिखाई दे रहा है। कटाई, छंटाई और परिवहन जैसे कार्यों में अतिरिक्त श्रमिकों की जरूरत पड़ती है। इससे गांवों में काम के अवसर बढ़े हैं। साथ ही, लघु उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध होने से क्षेत्रीय व्यापार को भी बल मिल रहा है। किसानों का मानना है कि यदि विपणन व्यवस्था और मजबूत हो जाए तो यह खेती लंबे समय तक स्थायी आय का स्रोत बन सकती है।
बांस की खेती ने लखीमपुर खीरी के किसानों को कम जोखिम में बेहतर कमाई का विकल्प दिया है। बदलती जरूरतों और बाजार की मांग को देखते हुए यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में बांस उत्पादन का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।

