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Sundarkhal village in Uttarakhand: सुंदरखाल की बगिया में बदली तक़दीर, बसंती की सेब खेती से आत्मनिर्भरता की कहानी

Sundarkhal village in Uttarakhand: उत्तराखंड के सुंदरखाल गांव की पहाड़ियों के बीच आज एक ऐसी बगिया लहलहा रही है, जो सिर्फ सेब के लाल फलों से नहीं, बल्कि एक महिला किसान के आत्मविश्वास The confidence of the woman farmer और मेहनत से भी चमक रही है। इस बगिया की मालकिन हैं बसंती, जिनकी खेती की यात्रा संघर्ष से शुरू होकर प्रेरणा तक पहुंची है। कुछ साल पहले तक वही ज़मीन, जो मुश्किल से गुज़ारा चला पाती थी, आज नई सोच और आधुनिक तकनीक से समृद्धि का प्रतीक बन चुकी है।

Sundarkhal village in uttarakhand

पारंपरिक खेती से बढ़ती चुनौतियां

बसंती पहले अपने छोटे से खेत में गोभी और गेहूं की खेती करती थीं। मेहनत खूब लगती थी, लेकिन नतीजा संतोषजनक नहीं होता था। जंगली जानवरों से फसल को नुकसान पहुंचता, पानी और मौसम की अनिश्चितता अलग परेशानी थी। लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता था। बार-बार के घाटे ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर इसी तरह चलता रहा तो खेती छोड़नी पड़ेगी।

नई राह की तलाश और बदलाव का फैसला

इसी सोच के दौरान बसंती Basanti while thinking ने सेब की आधुनिक खेती के बारे में जाना। यह तरीका पारंपरिक से अलग था, जिसमें कम जगह में ज्यादा उत्पादन संभव था। शुरुआत में मन में डर भी था, क्योंकि गांव में किसी ने ऐसा प्रयोग पहले नहीं किया था। लेकिन बसंती ने जोखिम लेने का फैसला किया और नई शुरुआत की ठानी।

हाई डेंसिटी एप्पल फार्मिंग का अनुभव

नई तकनीक के तहत लगाए गए सेब के पौधे आकार में छोटे The plants are small in size थे, लेकिन उनकी देखभाल और उत्पादन क्षमता कहीं अधिक थी। पौधारोपण, सिंचाई व्यवस्था और कीट नियंत्रण जैसी बारीक बातें सीखकर बसंती ने अपनी ज़मीन को एक व्यवस्थित बगिया में बदल दिया। जब पौधे लगाए गए, तो गांव के लोग देखने आए। कई लोगों को शक था कि पहाड़ी इलाके में यह प्रयोग सफल नहीं होगा, लेकिन बसंती को अपने फैसले पर भरोसा था।

कम समय में बेहतर परिणाम

मेहनत रंग लाई। पहले ही साल बसंती को सात पेटी सेब का उत्पादन मिला। दूसरे साल यह संख्या बढ़कर पचास पेटी तक पहुंच गई। यह उनके लिए बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि जहां पहले खेती से नुकसान होता था, वहीं अब आय का नया स्रोत बन गया था। धीरे-धीरे उनकी बगिया की पहचान आसपास के इलाकों में होने लगी।

खेती से जुड़ा नया अनुभव और आय का साधन

बसंती ने अपनी सेब की खेती को सिर्फ उत्पादन तक सीमित Limited to production only नहीं रखा। उन्होंने अपने घर में छोटा सा होमस्टे शुरू किया, जहां आने वाले मेहमान खुद पेड़ से सेब तोड़ सकते हैं। जो मेहमान खुद सेब तोड़ते हैं, उन्हें अलग दाम पर सेब मिलते हैं। इस अनोखे अनुभव ने उनके खेत को देखने आने वालों की संख्या भी बढ़ा दी और आय के नए रास्ते खुल गए।

गांव की महिलाओं के लिए प्रेरणा

बसंती की सफलता अब सिर्फ उनकी नहीं रही। गांव की कई महिलाएं उनसे सलाह लेने आने लगीं। कौन-सी किस्म के पौधे लगाएं, देखभाल कैसे करें, पानी और खाद का संतुलन कैसे रखें—इन सभी सवालों में बसंती उनका मार्गदर्शन करती हैं। उन्हें यह अच्छा लगता है कि उनका अनुभव दूसरों के काम आ रहा है और गांव की महिलाएं आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रही हैं।

खेती से जुड़ा आत्मिक जुड़ाव

बसंती के लिए खेती अब सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि सुकून और गर्व but peace and pride का कारण है। वे कहती हैं कि जब भी बाहर जाती हैं, तो वापस आकर अपनी बगिया में टहलना उन्हें सबसे ज्यादा अच्छा लगता है। पेड़ों के बीच रहकर उन्हें एक अलग ही शांति महसूस होती है, जो शायद किसी और काम में नहीं मिलती।

महिलाओं के लिए संदेश और भविष्य की सोच

महिला किसान दिवस के अवसर पर बसंती का संदेश साफ है। वे उन महिलाओं से अपील करती हैं जो किसी कारण से अपने गांव से दूर हैं कि अगर मौका मिले तो वापस आकर खेती से जुड़ें। अपने हाथों से कुछ बनाने का जो संतोष है, वह बहुत खास होता है। उनकी कहानी यह साबित करती है कि सही जानकारी, मेहनत और विश्वास से खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है।

टिकाऊ खेती की ओर एक कदम

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में यह आधुनिक सेब खेती जल संरक्षण, Agricultural water conservation बेहतर उत्पादन और जलवायु के अनुसार ढलने का एक अच्छा उदाहरण है। इस तरह की खेती से न केवल किसानों की आय बढ़ती है, बल्कि आने वाले समय के लिए खेती को सुरक्षित और टिकाऊ भी बनाया जा सकता है। बसंती की कहानी दिखाती है कि बदलाव की शुरुआत एक छोटे से फैसले से भी हो सकती है।

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