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Strawberry Farming Success story – अररिया में पारंपरिक खेती से आगे बढ़ा ये किसान

Strawberry Farming Success story – अररिया जिला अब केवल धान, मक्का और गेहूं की फसलों के लिए ही नहीं जाना जा रहा है। यहां के किसान बदलते समय के साथ खेती के नए विकल्पों को अपनाने लगे हैं। पारंपरिक कृषि पर निर्भर रहने के बजाय अब कई किसान अधिक लाभ देने वाली फसलों की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। इसी बदलाव की एक मिसाल रानीगंज प्रखंड के छररा पट्टी गांव में देखने को मिल रही है, जहां स्ट्रॉबेरी की खेती धीरे-धीरे पहचान बना रही है।

Araria strawberry farming success story

छररा पट्टी में नई शुरुआत

गांव के किसान घोलटू कुमार ने लगभग एक एकड़ जमीन पर स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू की है। उनका कहना है कि करीब 90 दिनों में फसल तैयार हो जाती है, जिससे कम समय में आय का अवसर मिलता है। पिछले पांच वर्षों से वे इस फसल पर लगातार काम कर रहे हैं। शुरुआती दौर में जानकारी और संसाधनों की कमी जरूर थी, लेकिन उन्होंने इसे प्रयोग के रूप में अपनाया और धीरे-धीरे अनुभव हासिल किया।

तकनीक के सहारे बढ़ा उत्पादन

घोलटू कुमार ने बताया कि एक पौधा लगभग 13 रुपये में पड़ा। उन्होंने मल्चिंग विधि और ड्रिप सिंचाई तकनीक का उपयोग किया, जिससे पानी की बचत के साथ पौधों को संतुलित नमी मिलती रही। खास बात यह है कि ड्रिप सिस्टम उन्होंने स्वयं तैयार किया। एक एकड़ में कुल लागत करीब 3 से 4 लाख रुपये तक आई। हालांकि शुरुआत में निवेश अधिक लगता है, लेकिन उत्पादन और बाजार मूल्य इसे संतुलित कर देते हैं।

बाजार में बेहतर कीमत

स्ट्रॉबेरी की मांग स्थानीय बाजार से लेकर बड़े शहरों तक बनी हुई है। किसान के अनुसार सीजन के दौरान उन्हें 400 से 500 रुपये प्रति किलो तक कीमत मिल जाती है। ऐसे में एक सीजन में करीब 8 लाख रुपये या उससे अधिक की आमदनी संभव हो पाती है। यही वजह है कि गांव के अन्य किसान भी इस दिशा में रुचि दिखा रहे हैं।

सरकारी योजनाओं से मिली प्रेरणा

घोलटू कुमार का कहना है कि कृषि से जुड़ी योजनाओं और प्रोत्साहन कार्यक्रमों ने उन्हें नई फसल अपनाने का हौसला दिया। शुरुआत में उन्होंने पुणे से पौधे मंगवाए और सावधानी से रोपण किया। धीरे-धीरे फसल की बढ़वार देखकर उनका आत्मविश्वास बढ़ा। अब वे अन्य किसानों के साथ मिलकर अनुभव साझा कर रहे हैं, ताकि अधिक लोग इस खेती से जुड़ सकें।

समूह में बढ़ रही खेती

गांव के कई किसान अब सामूहिक रूप से स्ट्रॉबेरी उगा रहे हैं। उनका मानना है कि पारंपरिक फसलों की तुलना में यह खेती थोड़ी महंगी जरूर है, लेकिन लाभ की संभावना अधिक है। पौधों, ड्रिप व्यवस्था, जैविक खाद और देखरेख पर खर्च होता है, परंतु अच्छी पैदावार और बाजार मूल्य से आय कई गुना बढ़ जाती है।

कम समय में बेहतर आय का विकल्प

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सही तकनीक और बाजार संपर्क उपलब्ध हो तो स्ट्रॉबेरी जैसी फसलें किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकती हैं। अररिया में हो रहा यह प्रयोग दर्शाता है कि छोटे किसान भी नवाचार अपनाकर आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकते हैं। करीब तीन महीने में तैयार होने वाली यह फसल अब जिले की कृषि पहचान को नया आयाम दे रही है।

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