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PMMSY Success Story: इस किसान ने मछली पालन से किया ऐसा कमाल, की आज गाँव का हर शख्स लेता है इनसे ट्रेनिंग…

PMMSY Success Story: ग्रामीण भारत में आज भी खेती को आय का मुख्य साधन माना जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के प्रगतिशील किसान हरिशंकर पटेल ने इस सोच को बदलकर एक नई इबारत लिखी है। उन्होंने पारंपरिक खेती के मोह को छोड़कर प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना का लाभ उठाने का साहसी निर्णय लिया। अपनी स्वयं की 0.607 हेक्टेयर भूमि पर तालाब का निर्माण कर उन्होंने (Blue Revolution in India) का हिस्सा बनने की ठानी। यह कदम न केवल उनके परिवार के लिए आर्थिक संबल लेकर आया, बल्कि आज वे पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा का एक जीवंत उदाहरण बन चुके हैं।

Pmmsy success story

अनुदान की शक्ति और आधुनिक जल प्रबंधन की व्यवस्था

एक सामान्य वर्ग के मत्स्य कृषक (PMMSY Success Story) होने के बावजूद हरिशंकर को सरकार की दूरदर्शी नीति के तहत तालाब निर्माण के लिए 40 प्रतिशत का भारी अनुदान प्राप्त हुआ। इस आर्थिक सहायता ने उन्हें (Modern Fish Pond Construction) की बारीकियों को समझने और लागू करने में मदद की। अनुदान की राशि का सही उपयोग करते हुए उन्होंने न केवल तालाब खुदवाया, बल्कि उसकी मेड़ को मजबूती प्रदान की और जल प्रबंधन की ऐसी अत्याधुनिक व्यवस्था सुनिश्चित की, जिससे पानी की बर्बादी कम हो और मछलियों के लिए अनुकूल वातावरण बना रहे।

उन्नत प्रजातियों का चयन और बीज संचयन में सरकारी मदद

मछली पालन की सफलता काफी हद तक बीजों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। हरिशंकर को मत्स्य पालन विभाग द्वारा रोहू, कतला और मृगल जैसी उन्नत और तेज बढ़ने वाली प्रजातियों के मत्स्य बीज 50 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध कराए गए। इसके साथ ही उन्होंने (High Yield Fish Seed) की विविधता को बढ़ाने के लिए अपने निजी संसाधनों से पंगास और रूपचंदा प्रजातियों का भी संचय किया। प्रजातियों की इस विविधता ने उन्हें बाजार की बदलती मांगों के अनुसार आपूर्ति करने में सक्षम बनाया, जिससे उनके जोखिम काफी कम हो गए।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पालन की तकनीकी बारीकियां

हरिशंकर की सफलता का सबसे बड़ा रहस्य उनका वैज्ञानिक तरीका है। वे केवल मछलियों को पानी में छोड़कर भूल नहीं जाते, बल्कि संतुलित आहार और जल की गुणवत्ता की चौबीसों घंटे निगरानी करते हैं। विशेषज्ञों की (Scientific Fish Farming Advice) के अनुसार समय पर बीज संचयन और उन्नत तकनीकों के इस्तेमाल से मछलियों की शारीरिक वृद्धि अपेक्षा से कहीं अधिक बेहतर हुई। उनके अनुशासन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे नवंबर से जनवरी के बीच ही मत्स्याखेट करते हैं, ताकि गुणवत्ता से कोई समझौता न हो।

स्थानीय बाजार में मांग और उचित मूल्य का गणित

जब उत्पाद की गुणवत्ता उत्कृष्ट होती है, तो बाजार खुद चलकर किसान के पास आता है। हरिशंकर द्वारा पाली गई कतला, रोहू और मृगल मछलियां स्थानीय बाजारों में 160 से 180 रुपये प्रति किलो की आकर्षक दर पर हाथों-हाथ बिक जाती हैं। वहीं, रूपचंदा और पंगास के लिए उन्हें (Fish Market Price Per Kg) के हिसाब से 110 से 130 रुपये तक का भाव आसानी से मिल जाता है। उचित और स्थायी मूल्य मिलने के कारण आज मछली पालन उनके लिए किसी घाटे के सौदे के बजाय एक समृद्ध व्यवसाय में तब्दील हो चुका है।

लाखों का शुद्ध मुनाफा और आर्थिक आत्मनिर्भरता का सफर

आंकड़ों की बात करें तो हरिशंकर पटेल आज प्रतिवर्ष लगभग 60 से 70 क्विंटल मछली का बंपर उत्पादन कर रहे हैं। सभी खर्चों को काटकर उन्हें सालाना 2.50 लाख से 3 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है। यह (Farmers Monthly Income Growth) दर्शाती है कि यदि किसान सरकारी योजनाओं का सही दिशा में उपयोग करें, तो ग्रामीण क्षेत्रों में भी शहर जैसी सम्मानजनक आजीविका प्राप्त की जा सकती है। उनकी मेहनत ने आज उन्हें एक आत्मनिर्भर उद्यमी की श्रेणी में खड़ा कर दिया है।

युवाओं और अन्य किसानों के लिए एक वैश्विक संदेश

हरिशंकर की कहानी यह स्पष्ट करती है कि सफलता के लिए बड़े संसाधनों से ज्यादा दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। आज वे उन युवाओं के लिए पथप्रदर्शक हैं जो नौकरी की तलाश में पलायन कर रहे हैं। उन्होंने (Rural Entrepreneurship Opportunities) को पहचानकर यह साबित कर दिया है कि मिट्टी और पानी के संगम से भी सोना उगाया जा सकता है। उनकी सफलता का संदेश साफ है कि सरकारी अनुदान और आधुनिक तकनीक का मेल किसी भी साधारण किसान की तकदीर बदल सकता है।

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना: भविष्य की एक नई उम्मीद

यह योजना देश के कोने-कोने में हरिशंकर जैसे हजारों ‘जल-उद्यमी’ तैयार कर रही है। सरकार का लक्ष्य मत्स्य उत्पादन को बढ़ाकर निर्यात के नए अवसर तलाशना है। हरिशंकर जैसे (Progressive Fish Farmers) इस राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करने में रीढ़ की हड्डी साबित हो रहे हैं। भविष्य में वे अपने तालाब के विस्तार और नई तकनीकों जैसे बायोफ्लॉक को अपनाने की योजना बना रहे हैं, जिससे उनकी आय में और अधिक वृद्धि होने की संभावना है।

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