SELF EMPLOYMENT

Organic Farming Success story – गोंडा के युवक ने जैविक सरसों से बढ़ाई आय

Organic Farming Success story – उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में एक युवा किसान पारंपरिक खेती से हटकर जैविक सरसों उत्पादन की दिशा में काम कर रहा है। बिना रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक के की जा रही यह खेती न केवल मिट्टी और पर्यावरण के लिए बेहतर साबित हो रही है, बल्कि आर्थिक रूप से भी लाभकारी नजर आ रही है। स्थानीय स्तर पर उनके प्रयासों की चर्चा हो रही है, क्योंकि कम लागत में बेहतर उत्पादन का उनका मॉडल अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है।

Gonda organic mustard farming success

खेत की तैयारी पर विशेष ध्यान

प्रगतिशील किसान मनीष कश्यप बताते हैं कि जैविक खेती की शुरुआत खेत की अच्छी तैयारी से होती है। बुवाई से पहले मिट्टी की गहरी जुताई कर उसे भुरभुरा बनाया जाता है, ताकि पौधों की जड़ें आसानी से फैल सकें। इसके बाद सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मी कंपोस्ट खेत में मिलाया जाता है। इससे मिट्टी की संरचना सुधरती है और उसमें पोषक तत्वों की मात्रा स्वाभाविक रूप से बढ़ती है। उनका कहना है कि रासायनिक खाद तुरंत असर दिखा सकती है, लेकिन लंबे समय में मिट्टी की सेहत पर असर डालती है, जबकि जैविक खाद धीरे-धीरे लेकिन स्थायी लाभ देती है।

पढ़ाई छोड़ी, खेती को बनाया आधार

मनीष कश्यप ने आठवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की। पारिवारिक और निजी कारणों से आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख पाए, लेकिन उन्होंने खेती को ही अपना भविष्य बनाने का फैसला किया। शुरुआत में उन्होंने परंपरागत तरीके से खेती की, पर धीरे-धीरे उनका रुझान जैविक पद्धति की ओर बढ़ा। उनका कहना है कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि सही दिशा में मेहनत की जाए तो खेती लाभ का जरिया बन सकती है। आज वह पूरी तरह जैविक तरीके से सरसों की खेती कर रहे हैं और अपने खेत में किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरक का उपयोग नहीं करते।

प्रयोग से मिला भरोसा

जैविक खेती अपनाने का विचार उन्हें तब आया जब गांव के पास किसी किसान ने वर्मी कंपोस्ट इकाई शुरू की। उत्सुकता में उन्होंने पहले सब्जी की फसल में इसका प्रयोग किया। परिणाम उम्मीद से बेहतर रहे। इसके बाद उन्होंने एक बीघा सरसों की फसल जैविक तरीके से और दूसरी बीघा रासायनिक पद्धति से उगाई। दोनों खेतों की तुलना में साफ अंतर दिखाई दिया। जैविक खेत की बालियां अधिक मोटी और दाने भरे हुए थे, जबकि रासायनिक खेती वाली फसल में गुणवत्ता अपेक्षाकृत कम रही। इसी अनुभव ने उन्हें पूरी तरह जैविक खेती की ओर प्रेरित किया।

लागत कम, लाभ की संभावना अधिक

मनीष बताते हैं कि इस बार उन्होंने करीब पांच बीघा में सरसों की बुवाई की है और आगे क्षेत्र बढ़ाने की योजना है। उनके अनुसार, पांच बीघा जैविक खेती में कुल लागत लगभग पांच से छह हजार रुपये के बीच आती है, जबकि रासायनिक पद्धति में खर्च अधिक हो जाता है। एक बीघा में लगभग दो क्विंटल उत्पादन होने की संभावना रहती है। इस हिसाब से पांच बीघा से करीब दस क्विंटल उपज की उम्मीद है। बाजार में सरसों का भाव पांच से छह हजार रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहता है, जिससे उन्हें संतोषजनक आय की संभावना दिख रही है।

पर्यावरण और सेहत के लिए सकारात्मक पहल

मनीष का मानना है कि जैविक खेती केवल आय का साधन नहीं, बल्कि मिट्टी और पर्यावरण की सुरक्षा का भी माध्यम है। रासायनिक दवाओं से दूरी बनाकर वह खेत की प्राकृतिक उर्वरता को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि किसान धीरे-धीरे रसायनों पर निर्भरता कम करें, तो खेती की लागत घटेगी और भूमि की गुणवत्ता भी बेहतर बनी रहेगी। स्थानीय स्तर पर कई किसान उनके अनुभव जानने के लिए उनके खेत पर पहुंच रहे हैं।

मनीष कश्यप का यह प्रयास दिखाता है कि छोटे स्तर से शुरू की गई पहल भी बड़े बदलाव का कारण बन सकती है। सही जानकारी, प्रयोग और धैर्य के साथ जैविक खेती ग्रामीण क्षेत्रों में आय और पर्यावरण संरक्षण दोनों का संतुलित रास्ता बन सकती है।

Back to top button