Kamlesh Tiwari Success Story: शिक्षक किसान ने राई की खेती से दिखाई नई राह
Kamlesh Tiwari Success Story: बिहार के सारण जिले में खेती की सोच अब तेजी से बदल रही है। युवा किसान पारंपरिक फसलों की सीमित आमदनी से आगे बढ़कर नई और लाभकारी खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। एकमा प्रखंड के बेतवनिया गांव में रहने वाले कमलेश तिवारी इसी बदलाव की एक मिसाल बनकर उभरे हैं। पेशे से सरकारी शिक्षक होने के बावजूद उन्होंने राई के साग की खेती को प्रयोग के तौर पर अपनाया और आज उनका यह प्रयास आसपास के किसानों के लिए चर्चा का विषय बन गया है।

शिक्षक से प्रगतिशील किसान तक का सफर
कमलेश तिवारी का मानना है कि खेती केवल परंपरा नहीं, बल्कि समझ और प्रयोग का क्षेत्र भी है। उन्होंने अपने घर के सामने थोड़ी सी जमीन में राई का साग लगाया। शुरुआत में यह केवल एक परीक्षण था, लेकिन परिणाम उम्मीद से बेहतर रहे। उनकी फसल की हरियाली और पत्तों का आकार देखकर गांव के लोग खुद जानकारी लेने पहुंचने लगे। एक शिक्षक के रूप में वे पढ़ाई के साथ-साथ खेती में भी नए प्रयोग करने के लिए जाने जाते हैं।
कम संसाधनों में बेहतर पैदावार
कमलेश बताते हैं कि राई का यह साग साधारण साग से अलग है। इसके पत्ते बड़े, मोटे और रसदार होते हैं। पांच लोगों के परिवार के लिए मात्र कुछ पत्ते ही पर्याप्त हो जाते हैं। देखने में यह पत्ता गोभी की तरह घना और आकर्षक लगता है। स्वाद के लिहाज से भी इसे बेहतर माना जा रहा है। सबसे खास बात यह है कि इसे उगाने में अधिक खर्च की जरूरत नहीं पड़ती। अगर मिट्टी में पर्याप्त नमी हो और समय पर सिंचाई की जाए तो रासायनिक खाद के बिना भी अच्छी पैदावार मिल सकती है।
जैविक खेती से लागत में कमी
आज जब खाद और कीटनाशकों की कीमतें बढ़ रही हैं, ऐसे में राई की यह खेती कम लागत का विकल्प बनकर सामने आई है। कमलेश ने पूरी तरह जैविक पद्धति से उत्पादन किया है। उनका कहना है कि गोबर की खाद जैसी प्राकृतिक सामग्री का सीमित उपयोग करने से भी फसल मजबूत रहती है। सारण जिले की मिट्टी इस फसल के लिए अनुकूल साबित हो रही है। चाहे बलुई जमीन हो या चिकनी, हर प्रकार की मिट्टी में यह साग अच्छी वृद्धि दिखा रहा है।
बाजार में बढ़ती मांग
स्थानीय बाजारों में राई के साग की मांग बनी रहती है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग हरी पत्तेदार सब्जियों को प्राथमिकता दे रहे हैं। कमलेश का कहना है कि यदि किसान बड़े स्तर पर इसकी खेती करें तो उन्हें बेहतर दाम मिल सकते हैं। अभी उन्होंने छोटे पैमाने पर शुरुआत की है, लेकिन भविष्य में क्षेत्र बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। उनका मानना है कि सही योजना और बाजार की समझ से किसान अपनी आय दो से तीन गुना तक बढ़ा सकते हैं।
अन्य किसानों के लिए प्रेरणा
कमलेश तिवारी अक्सर नई किस्मों और खेती के तरीकों पर जानकारी जुटाते रहते हैं। राह चलते किसान उनके खेत पर रुककर फसल को देखते हैं और तकनीक के बारे में पूछते हैं। वे खुलकर अपने अनुभव साझा करते हैं ताकि दूसरे किसान भी लाभ उठा सकें। उनका संदेश साफ है कि खेती में नवाचार अपनाने से आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है। शिक्षा और खेती का मेल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है।
किसानों के लिए संभावनाओं का रास्ता
राई का साग कम समय में तैयार होने वाली और कम मेहनत वाली फसल है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह आय बढ़ाने का व्यावहारिक विकल्प बन सकता है। कमलेश तिवारी की पहल यह दिखाती है कि यदि किसान स्थानीय परिस्थितियों को समझकर फसल का चयन करें, तो खेती लाभकारी व्यवसाय बन सकती है। सारण में शुरू हुआ यह प्रयोग आने वाले समय में व्यापक बदलाव की नींव रख सकता है।

