AGRICULTURE

Watermelon Farming – विंध्य क्षेत्र में अगेती तरबूज से बढ़ रही है किसानों की आय

Watermelon Farming – विंध्य क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों के दौरान तरबूज की अगेती खेती किसानों के लिए कम समय में बेहतर आमदनी का जरिया बनकर उभरी है। खासकर बाणसागर डूब क्षेत्र की खाली पड़ी जमीन को किसानों ने अवसर में बदला है। यहां फरवरी माह में बड़े पैमाने पर तरबूज की बुवाई की जा रही है, जिससे फसल गर्मी शुरू होने से पहले ही बाजार में पहुंच जाती है। कम प्रतिस्पर्धा और ज्यादा मांग का सीधा फायदा किसानों को मिल रहा है।

Watermelon farming vindhya income

अगेती खेती का बढ़ता रुझान

क्षेत्र के कई किसान अब पारंपरिक फसलों की बजाय तरबूज की अगेती खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, सर्दी के अंत और फरवरी की शुरुआत में बुवाई करने से फसल समय से पहले तैयार हो जाती है। इससे किसान उस दौर में बाजार में प्रवेश करते हैं, जब तरबूज की आपूर्ति सीमित होती है। परिणामस्वरूप उन्हें बेहतर दाम मिलते हैं और जोखिम भी कम रहता है।

बाणसागर डूब क्षेत्र बना खेती का केंद्र

बाणसागर डूब क्षेत्र में जलस्तर घटने के बाद जो भूमि खाली रह जाती है, वह तरबूज जैसी फसलों के लिए उपयुक्त साबित हो रही है। यहां की मिट्टी में नमी बनी रहती है, जिससे शुरुआती सिंचाई का खर्च भी कम होता है। किसानों का कहना है कि पहले यह जमीन अनुपयोगी समझी जाती थी, लेकिन अब यही भूमि आय का मजबूत साधन बन गई है। स्थानीय स्तर पर कई किसान समूह बनाकर सामूहिक रूप से खेती कर रहे हैं।

फरवरी क्यों है सबसे उपयुक्त समय

कृषि सलाहकारों का मानना है कि फरवरी में बुवाई करने से मौसम अनुकूल रहता है। अत्यधिक ठंड समाप्त हो चुकी होती है और तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है, जो तरबूज के पौधों की बढ़वार के लिए उपयुक्त है। समय पर बुवाई से फसल लगभग तीन महीने में तैयार हो जाती है और अप्रैल-मई की शुरुआत में बाजार में पहुंच जाती है। इस समय मांग अधिक और आपूर्ति सीमित रहती है।

लागत और संभावित मुनाफा

एक बीघा जमीन में अगेती तरबूज की खेती पर औसतन 18 से 20 हजार रुपये तक का खर्च आता है। इसमें बीज, खाद, सिंचाई और श्रम की लागत शामिल है। यदि मौसम अनुकूल रहे और फसल की देखभाल सही ढंग से की जाए, तो प्रति बीघा 70 से 80 हजार रुपये तक की आय संभव बताई जाती है। कम समय में इस तरह का मुनाफा किसानों के लिए आकर्षक विकल्प बन रहा है।

कम अवधि में तैयार होने वाली फसल

तरबूज की यह फसल करीब तीन महीने में तैयार हो जाती है। कम अवधि होने के कारण किसान साल में अन्य फसलों की भी योजना बना सकते हैं। इससे जमीन का बेहतर उपयोग होता है और आय के स्रोत बढ़ते हैं। जल्दी तैयार होने के कारण जोखिम की अवधि भी कम रहती है, जिससे मौसम से जुड़ी अनिश्चितताओं का प्रभाव घट जाता है।

बाजार में मांग का लाभ

गर्मी की शुरुआत में तरबूज की मांग तेजी से बढ़ती है। ऐसे समय में यदि स्थानीय स्तर पर उपज उपलब्ध हो तो व्यापारी सीधे खेतों तक पहुंचते हैं। इससे किसानों को परिवहन की अतिरिक्त लागत नहीं उठानी पड़ती। कई किसान मंडियों के साथ-साथ सीधे थोक व्यापारियों को भी माल बेच रहे हैं, जिससे उन्हें नकद भुगतान जल्दी मिल जाता है।

विशेषज्ञों की सलाह

कृषि विशेषज्ञ किसानों को उन्नत बीजों का चयन करने, समय पर सिंचाई और संतुलित उर्वरक उपयोग की सलाह दे रहे हैं। साथ ही, कीट और रोग प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने को कहा गया है। सही तकनीक अपनाने से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और गुणवत्ता बेहतर होने पर बाजार मूल्य भी अच्छा मिलता है।

विंध्य क्षेत्र में तरबूज की अगेती खेती अब केवल प्रयोग नहीं, बल्कि आय बढ़ाने का भरोसेमंद विकल्प बन चुकी है। उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग कर किसान कम समय में बेहतर आर्थिक परिणाम हासिल कर रहे हैं।

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