Farming Success story – पूर्वी चंपारण के किसान ने बदली गांव की तस्वीर
Farming Success story – बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के एक छोटे से गांव परसौनी की तस्वीर आज बदली हुई नजर आती है। खेतों में जहां पहले पारंपरिक फसलें लहलहाती थीं, वहीं अब दूर तक रंग-बिरंगे फूलों की कतारें दिखाई देती हैं। इस बदलाव के केंद्र में हैं किसान रामाधार प्रसाद, जिन्होंने अपनी सोच और प्रयोग के दम पर न सिर्फ अपनी आय बढ़ाई, बल्कि पूरे गांव को नई दिशा दे दी।

पारंपरिक खेती से असंतोष ने बदली सोच
करीब सोलह वर्ष पहले तक रामाधार प्रसाद भी अपने इलाके के अन्य किसानों की तरह गन्ना, धान और मक्का जैसी सामान्य फसलों की खेती करते थे। मेहनत खूब होती थी, लेकिन आमदनी उम्मीद के मुताबिक नहीं मिलती थी। बढ़ती लागत और सीमित मुनाफे ने उन्हें नए विकल्प तलाशने पर मजबूर किया। इसी बीच एक पारिवारिक यात्रा ने उनकी सोच को नई राह दिखा दी। बेटे के ससुराल गए तो वहां उन्होंने फूलों की खेती का सफल मॉडल देखा। वहीं से उनके मन में कुछ अलग करने का विचार अंकुरित हुआ।
छोटे प्रयोग से शुरू हुई बड़ी पहल
गांव लौटकर उन्होंने जोखिम उठाने का फैसला किया। शुरुआत महज दो कट्ठा जमीन में गेंदे की खेती से की गई। यह एक प्रयोग था, जिसमें उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली। स्थानीय बाजार में गेंदे के फूलों की अच्छी मांग थी और लागत की तुलना में लाभ संतोषजनक रहा। इस सकारात्मक परिणाम ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। धीरे-धीरे उन्होंने खेती का दायरा बढ़ाया और आज लगभग एक बीघा जमीन में गेंदा उगा रहे हैं। उनके खेतों की सफलता ने आसपास के किसानों का ध्यान भी खींचा।
पूरा गांव बना फूलों का केंद्र
रामाधार प्रसाद की पहल का असर धीरे-धीरे पूरे परसौनी गांव में दिखाई देने लगा। अन्य किसानों ने भी पारंपरिक फसलों के साथ या उनकी जगह गेंदा उगाना शुरू किया। देखते ही देखते गांव की पहचान बदल गई। अब यहां दूर-दराज के व्यापारी सीधे फूल खरीदने पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां उगाए गए फूल न केवल आसपास के जिलों में भेजे जा रहे हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश और नेपाल तक आपूर्ति हो रही है। इससे गांव की आर्थिक गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और किसानों की आय के नए रास्ते खुले हैं।
परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार
फूलों की खेती ने रामाधार प्रसाद के परिवार को भी मजबूती दी है। उनके बेटे पप्पू रंजन ने फूल और मालाओं की एक बड़ी दुकान शुरू की है, जिससे आय के अतिरिक्त स्रोत बने हैं। खेत से सीधे दुकान तक का यह मॉडल परिवार के लिए लाभदायक साबित हुआ है। अब वे केवल उत्पादक ही नहीं, बल्कि खुदरा विक्रेता भी हैं। इससे बिचौलियों पर निर्भरता कम हुई है और मुनाफा बढ़ा है। परिवार का कहना है कि यह बदलाव उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं।
खेती की प्रक्रिया और प्रमुख किस्में
रामाधार प्रसाद के अनुसार गेंदे की फसल लगभग 90 दिनों में तैयार हो जाती है। समय-समय पर खाद डालना, कीट नियंत्रण और फसल की सुरक्षा के उपाय करना जरूरी होता है। सही देखभाल से उत्पादन बेहतर मिलता है। परसौनी गांव में मुख्य रूप से चार किस्मों की खेती हो रही है—चीना, चेरी, मोगरा और पीला गेंदा। अलग-अलग किस्मों की मांग भी अलग होती है, जिससे बाजार में विविधता बनी रहती है। त्योहारी सीजन और शादी-विवाह के समय मांग और बढ़ जाती है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिलते हैं।
नई पहचान की ओर बढ़ता गांव
आज परसौनी गांव की पहचान सिर्फ एक सामान्य कृषि क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि फूल उत्पादन केंद्र के रूप में होने लगी है। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़े हैं और युवाओं का रुझान भी खेती की ओर बढ़ा है। रामाधार प्रसाद की कहानी यह दिखाती है कि सही समय पर लिया गया साहसिक निर्णय किस तरह पूरे समुदाय का भविष्य बदल सकता है। उनके प्रयास ने यह साबित किया है कि खेती में विविधता अपनाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।

