AGRICULTURE

VegetableFarming – फरवरी में सह फसली सब्जियों से बढ़ सकती है किसानों की आय

VegetableFarming – कौशांबी जिले में रबी सीजन के अंतिम दौर में किसान अब फरवरी की बुवाई की तैयारियों में जुट गए हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह महीना हरी सब्जियों की सह फसली खेती के लिए बेहद अनुकूल होता है। तापमान संतुलित रहने के कारण इस समय बोई गई फसलें तेजी से बढ़ती हैं और 40 से 45 दिनों के भीतर बाजार में पहुंच जाती हैं। गर्मी की शुरुआत के साथ ही हरी सब्जियों की मांग बढ़ने लगती है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिलने की संभावना रहती है।

February intercropping vegetable farming profit

फरवरी का संतुलित मौसम देता है बढ़त

कृषि विभाग के अनुसार फरवरी में औसत तापमान 20 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है, जो अधिकांश सब्जियों की शुरुआती वृद्धि के लिए उपयुक्त है। न अधिक ठंड और न ही तेज गर्मी—ऐसा मौसम पौधों के विकास को सहारा देता है। इस दौरान बोई गई मूली, पालक, गाजर और धनिया जैसी फसलें मार्च के अंत या अप्रैल की शुरुआत तक तैयार हो जाती हैं। यही वह समय होता है जब बाजार में ताजी सब्जियों की मांग बढ़ने लगती है। विवाह समारोहों का सीजन भी शुरू हो जाता है, जिससे थोक और खुदरा बाजार दोनों में कीमतों में उछाल देखने को मिलता है।

सह फसली खेती से कम समय में लाभ

सह फसली पद्धति में किसान एक ही खेत में अलग-अलग सब्जियां उगाते हैं, जिससे जमीन का बेहतर उपयोग होता है और जोखिम भी कम रहता है। मूली, पालक, गाजर और धनिया जैसी फसलें 40 से 45 दिनों में तैयार हो जाती हैं। कम अवधि वाली इन फसलों में लागत अपेक्षाकृत कम आती है और नकदी प्रवाह जल्दी शुरू हो जाता है। स्थानीय किसानों का कहना है कि एक बीघा में इन सब्जियों की खेती पर लगभग 8 से 10 हजार रुपये तक खर्च आता है। यदि फसल अच्छी रही तो 50 से 60 हजार रुपये तक की आमदनी संभव है।

किसानों का अनुभव क्या कहता है

कौशांबी के किसान भगवती प्रसाद मौर्य बताते हैं कि फरवरी में की गई बुवाई अक्सर समय पर बाजार तक पहुंच जाती है। उनका कहना है कि इस दौरान तैयार हुई फसल अप्रैल और मई तक अच्छी कीमत दिला देती है। मांग अधिक होने से सब्जियों की खपत तेजी से होती है और माल रुकता नहीं। यही कारण है कि कई किसान अब पारंपरिक फसलों के साथ-साथ सह फसली सब्जियों की ओर रुख कर रहे हैं।

लागत और संभावित मुनाफा

कृषि अधिकारियों के मुताबिक पालक, मूली, गाजर और धनिया जैसी फसलों में लागत सीमित रहती है। वहीं लौकी, कद्दू, करेला और नेनुआ जैसी बेल वाली सब्जियों में खर्च कुछ अधिक, लगभग 18 से 20 हजार रुपये प्रति बीघा तक हो सकता है। हालांकि इन फसलों में उत्पादन अधिक होने की स्थिति में आमदनी भी बेहतर हो सकती है। बाजार की स्थिति और पैदावार के आधार पर किसानों को अच्छा लाभ मिलने की संभावना रहती है।

सिंचाई और देखभाल है जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि फरवरी के बाद तापमान तेजी से बढ़ता है, जिससे मिट्टी की नमी कम होने लगती है। ऐसे में नियमित सिंचाई बेहद आवश्यक है। सप्ताह में कम से कम एक बार पानी देना और समय-समय पर खेत की निगरानी करना जरूरी है। कीट और रोग नियंत्रण के साथ-साथ निराई-गुड़ाई पर भी ध्यान देना चाहिए, ताकि पौधों की वृद्धि प्रभावित न हो।

कुल मिलाकर, फरवरी का महीना सब्जी उत्पादकों के लिए अवसर लेकर आता है। सही योजना, समय पर बुवाई और पर्याप्त सिंचाई के सहारे किसान कम समय में बेहतर आय प्राप्त कर सकते हैं।

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