BlackTurmeric – कम लागत में मुनाफे का नया रास्ता बनती काली हल्दी की खेती
BlackTurmeric – उत्तर प्रदेश में खेती के तौर-तरीकों में धीरे-धीरे बदलाव देखने को मिल रहा है। पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने के बजाय अब किसान ऐसी खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं, जिसमें लागत कम और आमदनी अपेक्षाकृत अधिक हो। इसी बदलाव की एक मिसाल लखीमपुर खीरी जिले में देखने को मिल रही है, जहां काली हल्दी की खेती किसानों के लिए लाभकारी विकल्प बनकर उभर रही है।

परंपरागत खेती से हटकर मसालों की ओर रुझान
लखीमपुर खीरी जिले के कई किसान अब धान और गेहूं जैसी फसलों के साथ मसाला फसलों को भी अपनाने लगे हैं। इसकी बड़ी वजह बाजार में मसालों की स्थिर मांग और बेहतर कीमत है। काली हल्दी, जो एक औषधीय पौधे के रूप में जानी जाती है, किसानों के बीच खासा आकर्षण पैदा कर रही है। सीमित संसाधनों में भी यह खेती अच्छी आमदनी देने की क्षमता रखती है।
निघासन के किसान ने दिखाई नई राह
निघासन तहसील क्षेत्र के प्रगतिशील किसान मनोज कुमार पांडे ने काली हल्दी की खेती को लेकर एक सफल प्रयोग किया है। उन्होंने ट्रायल के तौर पर दो बीघा भूमि में काली हल्दी की खेती शुरू की। मनोज पांडे का कहना है कि उन्होंने यह फैसला बाजार की मांग और फसल की औषधीय उपयोगिता को देखते हुए लिया। शुरुआती परिणाम उम्मीद के मुताबिक रहे हैं।
औषधीय गुणों के कारण बाजार में खास मांग
काली हल्दी को एक महत्वपूर्ण औषधीय जड़ी-बूटी माना जाता है। आयुर्वेदिक उपचारों में इसका उपयोग लंबे समय से किया जा रहा है। त्वचा रोग, सूजन और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने जैसी कई औषधीय विशेषताओं के चलते इसकी मांग लगातार बनी रहती है। यही वजह है कि व्यापारी और औषधि निर्माता काली हल्दी को अच्छे दामों पर खरीदने में रुचि दिखाते हैं।
सुगंधा वैरायटी बनी किसानों की पसंद
मनोज पांडे द्वारा उगाई जा रही सुगंधा किस्म की देसी काली हल्दी अपनी खुशबू और औषधीय गुणों के कारण जानी जाती है। यह किस्म मिट्टी और जलवायु के अनुसार बेहतर अनुकूलन दिखाती है, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता बनी रहती है। किसान बताते हैं कि इस वैरायटी की बाजार में पहचान पहले से मौजूद है, जिससे बिक्री में दिक्कत नहीं आती।
पूरी तरह जैविक तरीके से हो रही खेती
काली हल्दी की खेती में रासायनिक खादों का प्रयोग नहीं किया जा रहा है। मनोज पांडे ने बताया कि वे पूरी तरह जैविक पद्धति अपना रहे हैं। खेत में वर्मी कंपोस्ट और जीवामृत का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और फसल की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। जैविक उत्पादन होने के कारण बाजार में इसकी कीमत और बढ़ जाती है।
कम लागत में बेहतर मुनाफा
किसानों के अनुसार काली हल्दी की खेती में अन्य फसलों की तुलना में लागत कम आती है। बीज, खाद और सिंचाई पर सीमित खर्च होता है, जबकि तैयार फसल का मूल्य काफी अधिक मिलता है। यही कारण है कि छोटे और मध्यम किसान भी इसे अपनाने में रुचि दिखा रहे हैं। सही देखभाल और तकनीक के साथ यह खेती लंबे समय तक लाभ दे सकती है।
अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बनता मॉडल
मनोज पांडे की यह पहल अब आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रही है। कई किसान उनके खेत का निरीक्षण कर खेती की जानकारी ले रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान बाजार की मांग को समझकर ऐसी फसलों का चयन करें, तो उनकी आय में स्थायी बढ़ोतरी संभव है।

