Sponge gourd early farming: अगेती तोरई की खेती से बंपर मुनाफा कमाने के लिए अपनाएं ये आधुनिक तकनीकें
Sponge gourd early farming: सर्दियों के मौसम में सब्जियों की अगेती खेती करना किसानों के लिए जोखिम भरा तो होता है, लेकिन सही तकनीक अपनाई जाए तो यह बेहद मुनाफे का सौदा साबित होता है। जिला उद्यान अधिकारी डॉ. पुनीत कुमार पाठक के अनुसार, कड़ाके की ठंड और गिरते तापमान के बीच तोरई की फसल को सुरक्षित रखना और उससे समय से पहले उत्पादन लेना एक कला है। इसके लिए बीज के चुनाव से लेकर फसल की सुरक्षा तक हर कदम पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। जो किसान शुरुआती बाजार पकड़ने में सफल रहते हैं, उन्हें फसल के दाम सामान्य सीजन की तुलना में काफी बेहतर मिलते हैं।

उन्नत बीजों का चयन और अंकुरण क्षमता का महत्व
अगेती फसल की कामयाबी काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि आपने किस प्रकार के बीज का चयन किया है। ठंड के मौसम में सामान्य बीजों की अंकुरण क्षमता प्रभावित होती है, इसलिए डॉ. पाठक ऐसी हाइब्रिड किस्मों के चुनाव की सलाह देते हैं जो कम तापमान में भी पनप सकें। पूसा चिकनी, काशी दिव्या और वीएनआर जैसी किस्में अगेती बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त मानी गई हैं। ये किस्में न केवल पाले और शीतलहर को सहने की क्षमता रखती हैं, बल्कि कम समय में अधिक फल देकर किसानों को शुरुआती बाजार उपलब्ध कराती हैं।
लो-टनल तकनीक से पौधों को दें सुरक्षा कवच
तापमान में भारी गिरावट के दौरान नन्हे पौधों को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में लो-टनल तकनीक एक छोटे ग्रीनहाउस की तरह काम करती है और पौधों के लिए सुरक्षा कवच बन जाती है। इसमें पारदर्शी प्लास्टिक शीट की मदद से खेत में सुरंगनुमा ढांचा तैयार किया जाता है, जो सूर्य की किरणों को अंदर कैद कर लेता है। इससे बाहर कड़ाके की ठंड होने के बावजूद टनल के भीतर का तापमान काफी अधिक बना रहता है। यह वातावरण पौधों की निरंतर वृद्धि सुनिश्चित करता है, जिससे फसल रुकती नहीं और समय पर तैयार हो जाती है।
प्रो-ट्रे नर्सरी और खेत की वैज्ञानिक तैयारी
सर्दियों में सीधे खेत में बीज बोने के बजाय प्रो-ट्रे में नर्सरी तैयार करना एक समझदारी भरा फैसला है। कोकोपीट, वर्मीकुलाइट और परलाइट के संतुलित मिश्रण में बीज लगाकर उन्हें पॉलीहाउस या किसी गर्म स्थान पर रखना चाहिए। जब पौधे थोड़े बड़े हो जाएं और बाहर का मौसम अनुकूल लगे, तब इन्हें मुख्य खेत में रोपा जा सकता है। इससे बीजों के सड़ने का खतरा टल जाता है। खेत तैयार करते समय दोमट मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का उचित मिश्रण डालना चाहिए ताकि जड़ों को ठंड से लड़ने की ताकत मिले।
प्लास्टिक मल्चिंग और सिंचाई का सही प्रबंधन
मिट्टी के तापमान को स्थिर रखने और नमी को संरक्षित करने के लिए प्लास्टिक मल्चिंग एक वरदान है। मल्चिंग के प्रयोग से खरपतवार की समस्या भी कम हो जाती है और पौधों की जड़ें गर्म रहती हैं। सिंचाई के मामले में सावधानी बरतते हुए किसानों को सलाह दी जाती है कि वे शाम के समय हल्की सिंचाई करें। रात के समय खेत में नमी रहने से पाले का असर कम हो जाता है। यदि संभव हो तो ड्रिप सिंचाई प्रणाली का उपयोग करें, क्योंकि यह अगेती फसल के लिए पानी के प्रबंधन का सबसे सटीक तरीका है।
रोगों से बचाव और मचान विधि के फायदे
अधिक नमी और कम धूप के कारण फसल में फफूंद जनित रोगों का खतरा बढ़ जाता है। डाउनी मिल्ड्यू और पाउडी मिल्ड्यू जैसी बीमारियों से बचने के लिए नियमित तौर पर फफूंदनाशकों का छिड़काव आवश्यक है। साथ ही लाल कद्दू बीटल जैसे कीटों से सुरक्षा के लिए नीम के तेल का प्रयोग प्रभावी रहता है। तोरई की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए उसे मचान विधि से उगाना बेहतर होता है। बांस और तारों के सहारे बेलों को ऊपर चढ़ाने से फलों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है, जिससे वे चमकदार बनते हैं और मिट्टी के संपर्क में न रहने के कारण रोगों से बचे रहते हैं।

