SELF EMPLOYMENT

5F Model: भारतीय छोटे किसानों के लिए आत्मनिर्भर और टिकाऊ खेती की दिशा में एक व्यावहारिक समाधान

5F Model: भारत के विशाल कृषि परिदृश्य में पिछले कई दशकों से एक मौन संकट पनप रहा है। छोटे और सीमांत किसान, जो देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ माने जाते हैं, लगातार बढ़ती चुनौतियों से जूझ रहे हैं। भूमि का आकार घटता जा रहा है, जबकि खेती के लिए बाजार पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। रासायनिक उर्वरक, डीजल, बिजली और पशु आहार जैसे जरूरी इनपुट की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जिससे खेती की लागत बढ़ती है और मुनाफा कम होता चला जाता है। दूसरी ओर, खेतों में उपलब्ध संसाधन जैसे पशुओं का गोबर और फसल अवशेष अक्सर सही उपयोग के अभाव में बेकार चले जाते हैं, जबकि इनमें आत्मनिर्भरता की बड़ी संभावना छिपी हुई है।

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आत्मनिर्भर खेती की खोज की पृष्ठभूमि

इन्हीं परिस्थितियों के बीच वर्ष 2010 में Agriliv Research Foundation द्वारा एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया कि क्या छोटे किसान टिकाऊ तरीके से आत्मनिर्भर और लाभकारी बन सकते हैं। इस सवाल का जवाब किसी महंगी तकनीक या रासायनिक समाधान में नहीं, बल्कि खेत पर पहले से मौजूद संसाधनों के बेहतर एकीकरण में खोजा गया। इसी सोच से 5F Model की अवधारणा सामने आई, जिसे हरियाणा के सोनीपत जिले के चिड़ाना गांव में प्रयोग के तौर पर लागू किया गया।

5F मॉडल की मूल अवधारणा

5F मॉडल का आधार circular economy की सोच पर टिका है। यह एक integrated farming framework है, जिसमें खेती से जुड़े अलग-अलग घटक एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। एक प्रक्रिया से निकलने वाला आउटपुट दूसरी प्रक्रिया के लिए इनपुट बनता है। इसका उद्देश्य waste to wealth की अवधारणा को व्यवहार में लाना है, ताकि किसान बाहरी संसाधनों पर निर्भर हुए बिना अपनी आय बढ़ा सके।

चिड़ाना केंद्र: एक जीवंत प्रयोगशाला

चिड़ाना में स्थापित केंद्र को एक living laboratory के रूप में विकसित किया गया, जहां इस मॉडल को लगभग 15 वर्षों तक परखा और सुधारा गया। यहां 10 दुधारू पशु, 6 एकड़ कृषि भूमि, 85 क्यूबिक मीटर क्षमता का biogas plant और vermicompost unit स्थापित की गई। इस पूरे सिस्टम में संसाधनों का प्रवाह एक चक्रीय प्रक्रिया के रूप में काम करता है।

संसाधनों का चक्रीय प्रवाह

इस मॉडल की शुरुआत पशुपालन से होती है। पशुओं से प्राप्त गोबर को बायोगैस प्लांट में डाला जाता है, जिससे cooking fuel के रूप में गैस मिलती है। बायोगैस से निकलने वाली स्लरी को vermicompost में बदलकर organic fertilizer तैयार किया जाता है। यही खाद खेतों में डाली जाती है, जिससे soil fertility बढ़ती है और फसल उत्पादन बेहतर होता है। खेतों से प्राप्त green fodder और फसल अवशेष फिर से पशुओं के चारे के रूप में उपयोग होते हैं। पशु दूध और गोबर के रूप में income generation और food security दोनों में योगदान देते हैं, और यह चक्र लगातार चलता रहता है।

आर्थिक लाभ और लागत में बचत

इस integrated system का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसान को रासायनिक खाद, एलपीजी और बाहरी चारे पर खर्च कम करना पड़ता है। चिड़ाना केंद्र के पायलट प्रोजेक्ट से यह साबित हुआ कि इस मॉडल के जरिए सालाना लगभग 21 लाख रुपये तक की आय और बचत संभव है। यह राशि किसी एक गतिविधि से नहीं, बल्कि farming, dairy, biogas, vermicompost और fodder production के संयुक्त प्रभाव से प्राप्त होती है।

जोखिम कम करने की रणनीति

5F मॉडल केवल आय बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह risk management का भी प्रभावी तरीका है। जब किसान अपने खेत पर ही fertilizer production, fuel generation और animal feed का प्रबंध कर लेता है, तो वह बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव से काफी हद तक सुरक्षित हो जाता है। इससे खेती अधिक स्थिर और भरोसेमंद आजीविका बनती है।

प्रशिक्षण और प्रसार की प्रक्रिया

2015 से 2025 के बीच चिड़ाना केंद्र को demonstration hub और training centre के रूप में विकसित किया गया। इस दौरान 1500 से अधिक किसानों को practical training दी गई। प्रशिक्षण में multilayer farming, vegetable cultivation, cow rearing, biogas management और organic input preparation जैसे विषय शामिल थे।

ग्रामीण समाज पर व्यापक प्रभाव

इस पहल ने केवल किसानों को ही नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज के अन्य वर्गों को भी सशक्त किया। महिला self help groups को compost आधारित micro enterprise से जोड़ा गया। ग्रामीण युवाओं को agri services, animal health और enterprise management में प्रशिक्षित किया गया, जिससे rural employment के नए अवसर पैदा हुए और पलायन पर अंकुश लगा।

टिकाऊ और विस्तार योग्य मॉडल

चिड़ाना के अनुभव से यह स्पष्ट हुआ कि 5F मॉडल 6 एकड़ ही नहीं, बल्कि 2 एकड़ जैसी छोटी जोत पर भी सफलतापूर्वक लागू किया जा सकता है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। भारत में अधिकांश किसान सीमांत श्रेणी में आते हैं, और उनके लिए यह मॉडल एक व्यवहारिक समाधान बनकर उभरता है।

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