AGRICULTURE

RidgeGourdFarming – कम समय में ज्यादा पैदावार देने वाली तोरई की किस्में किसानों के लिए फायदेमंद

RidgeGourdFarming – तोरई की खेती देश के कई हिस्सों में किसानों के लिए आय का एक भरोसेमंद विकल्प बनती जा रही है। खासकर ऐसी उन्नत किस्में जिनसे कम समय में अच्छी पैदावार मिल सके, किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित कई किस्में ऐसी हैं जो कम अवधि में तैयार होने के साथ-साथ रोगों के प्रति भी बेहतर सहनशीलता रखती हैं। इन किस्मों की खेती करने से किसानों को उत्पादन बढ़ाने के साथ बाजार में बेहतर कीमत मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है। सही किस्म, उपयुक्त मौसम और वैज्ञानिक तरीके अपनाकर तोरई की खेती से अच्छी आमदनी प्राप्त की जा सकती है।

Ridge gourd high yield varieties

पूसा सुप्रिया: कम समय में तैयार होने वाली उन्नत किस्म

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) द्वारा विकसित पूसा सुप्रिया किस्म को जल्दी तैयार होने वाली किस्मों में प्रमुख माना जाता है। यह किस्म बोवाई के करीब 50 दिन बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है, जिससे किसानों को कम समय में उत्पादन मिलना शुरू हो जाता है। इसके फल मध्यम आकार के, चिकने और आकर्षक हरे रंग के होते हैं, जो बाजार में आसानी से बिक जाते हैं।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह किस्म कई सामान्य रोगों के प्रति अपेक्षाकृत सहनशील है, जिससे फसल की सुरक्षा पर होने वाला खर्च भी कम हो सकता है। 25 से 37 डिग्री सेल्सियस के तापमान वाले क्षेत्रों में इसकी वृद्धि बेहतर देखी गई है। अनुकूल परिस्थितियों में इसकी पैदावार लगभग 130 से 140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है, जो छोटे और मध्यम किसानों के लिए लाभदायक साबित होती है।

पंत चिकनी तोरई-1: लंबाई और गुणवत्ता के कारण बाजार में मांग

जिला उद्यान अधिकारी डॉ. पुनीत कुमार पाठक के मुताबिक गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय द्वारा विकसित पंत चिकनी तोरई-1 भी किसानों के बीच लोकप्रिय किस्मों में शामिल है। इस किस्म के फल लंबे, बेलनाकार और आकार में एकसमान होते हैं, जिससे बाजार में इसकी अच्छी मांग रहती है।

इस किस्म की एक और खासियत यह है कि बोवाई के लगभग 50 से 55 दिन बाद पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है। सही प्रबंधन और देखभाल के साथ इसकी खेती से किसान करीब 140 से 170 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। समान आकार और बेहतर गुणवत्ता के कारण मंडियों में इस किस्म के फलों को आसानी से खरीदार मिल जाते हैं।

पूसा चिकनी: अधिक उत्पादन देने वाली किस्म

यदि किसान ज्यादा उत्पादन की तलाश में हैं, तो पूसा चिकनी किस्म एक अच्छा विकल्प मानी जाती है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित इस किस्म के फल चिकने और मध्यम आकार के होते हैं, जो उपभोक्ताओं को आकर्षित करते हैं।

हालांकि इस किस्म को तैयार होने में लगभग 60 से 70 दिन का समय लगता है, लेकिन इसकी उत्पादन क्षमता काफी अधिक बताई जाती है। उचित खेती प्रबंधन के साथ इसकी पैदावार 150 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है। यह किस्म खास तौर पर उन क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करती है जहां गर्मियों के मौसम में उपजाऊ और जैविक पदार्थों से भरपूर मिट्टी उपलब्ध होती है।

काशी दिव्या: रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्म

भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी द्वारा विकसित काशी दिव्या किस्म अपनी रोग सहनशीलता के लिए जानी जाती है। इसके फल पतले, मुलायम और गूदेदार होते हैं, जो उपभोक्ताओं के बीच पसंद किए जाते हैं।

इस किस्म की विशेषता यह है कि यह डाउनी मिल्ड्यू जैसे रोगों के प्रति अपेक्षाकृत सहनशील मानी जाती है। इससे किसानों को कीटनाशकों पर होने वाले खर्च में कमी आ सकती है। लगभग 60 दिन में तैयार होने वाली यह किस्म सामान्य परिस्थितियों में 130 से 160 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने में सक्षम बताई जाती है।

कल्याणपुर हरी चिकनी: उच्च पैदावार के लिए प्रसिद्ध

चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर द्वारा विकसित कल्याणपुर हरी चिकनी किस्म भी अधिक उत्पादन देने के लिए जानी जाती है। इसके फल पतले, हरे और स्वाद में अच्छे माने जाते हैं, जिसके कारण बाजार में इसकी अच्छी मांग रहती है।

इस किस्म की पहली तुड़ाई लगभग 60 से 70 दिनों में शुरू हो जाती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार अनुकूल परिस्थितियों में इसकी पैदावार 200 से 220 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है। अधिक उत्पादन क्षमता के कारण यह किस्म उन किसानों के बीच खास तौर पर लोकप्रिय है जो सब्जी की खेती से ज्यादा मुनाफा कमाना चाहते हैं।

सफल तोरई खेती के लिए जरूरी परिस्थितियां

तोरई की अच्छी पैदावार के लिए सही जलवायु और मिट्टी का चयन महत्वपूर्ण माना जाता है। यह फसल गर्म और आर्द्र मौसम में तेजी से बढ़ती है, इसलिए ऐसे क्षेत्रों में इसकी खेती बेहतर परिणाम दे सकती है। खेत का चयन करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि जमीन में पानी का ठहराव न हो और जल निकासी की उचित व्यवस्था मौजूद हो।

विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी का पीएच मान लगभग 6.5 से 7.5 के बीच होना उपयुक्त रहता है। बुवाई से पहले खेत में पर्याप्त मात्रा में गोबर की सड़ी हुई खाद या अन्य जैविक खाद डालने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। इससे पौधों की वृद्धि अच्छी होती है और फलों की गुणवत्ता भी बेहतर रहती है।

मार्च का महीना क्यों माना जाता है उपयुक्त

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि मार्च का महीना तोरई की बुवाई के लिए काफी अनुकूल रहता है। इस समय कई क्षेत्रों में गन्ने की कटाई के बाद खेत खाली हो जाते हैं, जिससे किसान आसानी से सब्जी की खेती शुरू कर सकते हैं।

मार्च में बोई गई फसल आमतौर पर मई और जून के महीनों में तैयार होकर बाजार में पहुंचती है। इस समय गर्मी के कारण हरी सब्जियों की उपलब्धता अपेक्षाकृत कम होती है, जबकि मांग अधिक रहती है। ऐसे में किसानों को अपनी उपज के अच्छे दाम मिलने की संभावना बढ़ जाती है। कम अवधि में तैयार होने वाली इस फसल से किसानों को निवेश की राशि जल्दी वापस मिलने के साथ बेहतर लाभ भी मिल सकता है।

Back to top button